Who Was JagadGuru Shri Ramanandacharya

Bhakti Saint. Social Reformer. Visionary Guru.

Shri Ramanandacharya Ji (14th century) was a pioneering figure in the Bhakti movement and the founding spiritual master of the Ramanandi Sampradaya. At a time when religious practices were heavily restricted by caste and social boundaries, he championed equality, universal devotion, and the oneness of all beings before God.

He taught that the divine name of Shri Ram is open to all—regardless of birth, background, or status—and that the path of Bhakti (devotional love) is the truest way to attain God.

जगद्गुरु श्रीमदाद्य  रामानन्दाचार्य एवं सामाजिक योगदान​

 रामानन्दाचार्यजी का संक्षिप्त परिचय​, शैक्षणिक योगदान (ग्रन्थ – प्रस्थानत्रय​, वेदान्तदर्शन​, वैष्णव-मताब्ज भास्कर​, अध्यात्म रामरक्षा, ज्ञान गुदड़ी आदि, गुरुकुल पद्धति, प्रसिद्ध शिष्य परम्परा – श्रीतुलसीदासजी, श्रीअग्रदासजी आदि )

भारतवर्ष की परमपावन भूमि सदा से धर्म, संस्कार और आध्यात्म की महान परम्पराओं की पालक रही है। यह भूमि केवल ऋषियों-मुनियों की तपोभूमि ही नहीं, अपितु एक ऐसी चेतन संस्कृति की वाहिका रही है जिसने सम्पूर्ण विश्व को शांति, करुणा, सहिष्णुता और सह-अस्तित्व का अमूल्य संदेश प्रदान किया है।

इस पुण्यभूमि में युगों-युगों से भगवान स्वयं एवं उनके परम भक्तों ने विविध रूपों में अवतार लेकर न केवल अधर्म का विनाश किया, अपितु मानवता के लिए धर्म, प्रेम और सेवा का मार्ग प्रशस्त किया है। इन्हीं दिव्य अवतारों में अग्रगण्य हैं — स्वयं साकेतपति, अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायक, मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के साक्षात अवतार, हिन्दू धर्मोद्धारक, पतितपावन, जगद्गुरु श्रीमदाद्य रामानन्दाचार्य जी महाराज।

उन्होंने न केवल सनातन धर्म की प्रतिष्ठा को दृढ़ किया, अपितु अपने व्यापक वैष्णव सिद्धान्तों के माध्यम से समाज के प्रत्येक वर्ग को भक्ति के आलोक से आलोकित किया। रामानन्दाचार्यजी महाराज ने ‘जाति-पाँति पूछे नहिं कोई’ के सिद्धान्त को मूर्त रूप देते हुए भक्तिकाल में समरसता, समर्पण और भगवद्भक्ति की एक अद्वितीय धारा प्रवाहित की।

श्रीरामानन्दाचार्य जी ने आर्ष परम्परा का अनुसरण करते हुए, भगवान बोधायन (महर्षि पाणिनी के गुरु जो आचार्य  परम्परा में वैष्णव जगत में श्री पुरूषोत्तमाचार्य नाम से प्रसिद्ध हुए) द्वारा प्रवर्तित श्रुतियों के गुह्य रहस्य, अर्थात् विशिष्टाद्वैत वेदान्त के सिद्धान्तों को आधार बनाकर, प्रस्थानत्रयी — मुख्य उपनिषद, ब्रह्मसूत्र, एवं श्रीमद्भगवद्गीता — पर भाष्य का प्रणयन कर एक अत्यन्त महान दार्शनिक कार्य सम्पन्न किया।

उनका यह प्रयास न केवल वैदिक दर्शनों के पुनरुत्थान की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था, बल्कि इससे रामानन्द सम्प्रदाय की दार्शनिक नींव को भी दृढ़ता प्राप्त हुई।

इसी के साथ, वैष्णव धर्म के शील और सदाचार की रक्षा हेतु उन्होंने वैष्णवमताब्जभास्कर जैसे ग्रन्थों की रचना की, जो आज भी वैष्णवाचार के आदर्शों का दिग्दर्शन कराते हैं।

योग और आन्तरिक साधना के क्षेत्र में भी उनका योगदान अत्यन्त महत्वपूर्ण रहा। ‘अध्यात्म रामरक्षा’ और ‘ज्ञान गुदड़ी’ जैसे ग्रन्थों के माध्यम से उन्होंने साधक को अभ्यन्तर शुद्धि, भगवत्स्मरण, एवं आत्म-साक्षात्कार की दिशा में प्रेरित किया।​